रविवार, 10 अक्तूबर 2010

अन्योक्तियॉ (1)


अन्योक्तियॉ (1)

बात पुरानी है, एक नगर में एक परिवार रहता था। जिसमें कुल सात सदस्य थे पति-पत्नी, तीन पुत्र और दो कन्याएं। उस परिवार का ज्येष्ठ पुत्र विवाहित हुआ, नवदाम्पत्त्य के दिन हास-परिहास, आमोद-प्रमोद में व्यतीत होने लगे। इसी बीच कब उस दम्पत्ति के ऑगन में दो पुष्प खिल गए इसका उन्हें भान ही न रहा। समय अपनी गति से चलता रहा, संयोग से उस पुत्र की आजीविका बहुत दूर लग गई और वह अपनी नौकरी के लिए चला गया।

अब दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे की याद में खोए रहने लगे। यहॉ घर में वह प्रवत्स्यत्पतिका गृहिणी सोचती थी कि चलो भले ही मुझे प्रियतम से वियोग है किन्तु वे जहॉ भी हैं सुख से तो है। उधर बेचारा विरहविधुर पति, अपने माता-पिता की सुविधा और बच्चों के भविष्य को अर्थाधीन मान कर नानाविध प्रवासजनित समस्याओं एवं कष्टों सहन करते हुए किसी प्रकार अपनी आजीविका से अपने जोड़े हुए था।

विरहव्यथित दम्पत्ति की इस अवस्था को देखकर कोई कवि सहसा अन्योक्ति के माध्यम से कह उठता है -

हंसी वेत्ति परागपिंजरतनुः कुत्रापि पद्माकरे,
प्रेयान् मे बिसकन्दलीं कवलयन् भुंक्ते स्वयं स्वेहया।
नो जानाति तपस्विनी यदनिशं जंबालमालोडयन,
शैवालाकुंरमप्यसौ न लभते हंसो विशीर्णच्छदः।।


अर्थात् ‘हंसिनी सोच रही है कि मेरे प्रियतम राजहंस इस दुर्दिन से दूर कहीं किसी कमलवन के पराग से सुवासित सरोवर में रह रहे हैं और वे वहॉ अपनी इच्छा भर कमलनाल का भक्षण करते होंगे। किन्तु वह बेचारी हंसिनी यह नहीं जानती कि उसका राजहंस किसी कीचड़ भरे दलदल में फंसा हुआ है जहॉ उसे खाने के लिए सेवार आदि भी नहीं प्राप्त हो पा रहे हैं और उसका शरीर कुपोषण से कान्तिहीन हो गया है’।

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