शनिवार, 25 सितंबर 2010

संस्कृत वाङ्मय में कामशास्त्र की परम्परा (2)

संस्कृत वाङ्मय में कामशास्त्र की परम्परा (2)


महाकाल की अविरल धारा में निरन्तर प्रवहमान विश्ववारा वाक्स्वरूपा भगवती भारती अपनी परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी रूपी शक्तियों के द्वारा भारतीय मनीषा की चिन्तनशक्ति को प्रतिबोधित कर संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान की समष्टि को अवधारित करते हुए विश्वमनीषा को उद्बोधित करने वाले संस्कृत वाङ्मय के विशाल कलेवर में श्रीवृद्धि करने वाली आर्यमनीषा के चिन्तक क्रान्तदर्शी ऋषियों ने ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक पक्ष पर अपने चिन्तन को लोक कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है। मानव-जीवन को अनुशासित करने उद्देश्य से प्रजापति ब्रह्मा ने एक आचार संहिता का निर्माण किया, जिसे कालान्तर में ऋषियों ने त्रिवर्गरूप पुरुषार्थ के अनुसार पृथक्शास्त्र के रूप में प्रवचित किया। कालान्तर में उस आचार संहिता के धर्मशास्त्रीय भाग को स्वायम्भुव मनु ने, अर्थशास्त्रीय भाग को आचार्य बृहस्पति ने तथा कामशास्त्रीय भाग को आचार्य नंदिकेश्वर ने पृथक्पृथक् प्रवचित किया।

कामशास्त्र के प्रतिष्ठापक आचार्य मल्लनाग वात्स्यायन कामसूत्र के मंगलाचरण परक अपने प्रथम सूत्र धर्मार्थकामेभ्यो नमः“(कामसूत्र 1/1/1) के द्वारा किसी देवी-देवता की वन्दना न कर ग्रन्थ-प्रतिपाद्य धर्म, अर्थ एवं काम रूप त्रिवर्ग की वन्दना करते हैं। कारण ? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र; ये चतुर्वर्ण तथा ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास; ये चार आश्रम हैं। इनमें स्थित प्रायः सभी प्राणी मोक्ष की कामना नहीं करते हैं; क्योंकि धर्म, अर्थ एवं काम रूप त्रिवर्ग में जो प्राणी पूर्णता प्राप्त कर लेता है वह स्वतः ही मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। अतः त्रिवर्ग ही लोक का परम पुरुषार्थ है। आचार्य वात्स्यायन इसका उद्घोष प्रजापतिर्हि प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थितिनिबन्धनं त्रिवर्गस्य (काम01/1/5) कहकर करते हैं; जिसका अनुमोदन छान्दोग्योपनिषद् (2/23/2), महाभारत (59/29-30), मत्स्यपुराण (54/3-4) आदि आकर ग्रन्थ भी करते हैं।

त्रिवर्ग एवं मोक्ष; यह चतुर्वर्ग ही भारतीय सभ्यता एवँ संस्कृति की आधारभित्ति है। मानव मात्र की समस्त आकांक्षाएं-अभिलाषाएं इन्हीं में सन्निहित हैं। इन कामनाओं की परितुष्टि हेतु मानव में शरीर, बुद्धि, मन एवं आत्मा; ये चार अंग हैं; जो कि अनन्त कामनाओं एवं आवश्यकताओं के केन्द्र में स्थित हैं। इनमें बुद्धि के लिए धर्म की, शरीर-पोषण के लिए अर्थ की, मनस्तुष्टि के लिए काम की तथा आत्मसंतुष्टि के लिए मोक्ष की आवश्यकता पड़ती है। ये आवश्यकताएँ अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं।

इस प्रकार जीवन-निर्वहन की आकांक्षा ‘अर्थ’ में; स्त्रीपुत्रादि की ‘काम’ में; यश, ज्ञान, न्याय आदि की ‘धर्म’ में एवँ पारलौकिक अभ्युदय की कामना ‘मोक्ष’ में समाविष्ट रहती है। परन्तु इस चतुर्वर्ग में मानवमात्र ही नहीं, अपितु प्राणिमात्र पर यदि किसी का दुर्धर्ष प्रभाव है तो केवल ”काम“ का ही है। अब प्रश्न यह उठता है कि प्राणिमात्र को अभिभूत करने वाला दुर्धर्ष ‘काम’ क्या है? इसके समाधान में आचार्य वात्स्यायन - 'श्रोतत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानां आत्मसंयुक्तेन मनसाधिष्ठितानां स्वेषु स्वेषु विषयेष्वानुकूल्यतः प्रवृत्तिः कामः।।' (कामसूत्र 1/2/11) कह कर पंच ज्ञानेन्द्रियों की अपने-अपने विषयों में मनसाधिष्ठित आत्मसंयुक्त प्रवृत्ति को ही ‘काम’ स्वीकार करते हैं। इस प्रकार श्रोत, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण रूप पंच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से आत्मा को मन-बुद्धि के द्वारा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द रूपी सांसारिक कार्य-व्यापार रूप विषय का उपभोग करने में जिस अनुकूलता अर्थात् सुख का अनुभव होता है, वह प्रवृत्ति ही ‘काम’ है। किन्तु काम का यह स्वरूप सार्वभौमिक है। सृष्टि की सभी अनुकूलनात्मक क्रियाएं इसमें अन्तर्भुक्त हो जाती हैं। क्योंकि धर्मपालन में, अर्थसाधन में, स्त्रीपुत्रादि स्नेह में, विद्याध्ययन में, परोपकार में, प्रकृति की रमणीयता के दर्शन इत्यादि में आत्मा को ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से अनुकूलता की प्रतीति होने के कारण ये क्रियाएं भी काम का ही परिणाम हैं। यह विशेष काम व्यावहारिक रूप से मानव को चुम्बनालिंगनादि सहित शरीर के विशेष अंगस्पर्शजनित आनन्द की फलवती अर्थप्रतीति के रूप में भी ग्राह्य माना गया है।

काम की उत्पत्ति कैसे हुयी? इस प्रश्न पर विचार करते हुए वैदिक ऋषि का कथन है -
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषाः।।
(ऋग्वेद10/129/4)
अर्थात् ‘सृष्ट्युत्पत्ति के समय सर्वप्रथम ‘काम’ अर्थात् सृष्टि उत्पन्न करने की इच्छा उत्पन्न हुयी, जो परब्रह्म के हृदय में सर्वप्रथम सृष्टि का रेतस् अर्थात् बीजरूप कारण विशेष था, जिसे शुद्ध-बुद्ध ज्ञानवान् मनीषी कवियों ने हृदयस्थ परब्रह्म का गम्भीर अनुशीलन कर प्राप्त किया था।’ अतः ऋग्वेद के इस कथन से स्पष्ट है कि सृष्टि के मूलकारण ”काम“ की उत्पत्ति परब्रह्म के हृदय से हुयी और उस परमात्मा ने हृदय में सनातन रूप में अवस्थित कामभावना के कारण ही इच्छा की कि वह बहुत सी प्रजा उत्पन्न करे -
‘सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेत। काममय एवायं पुरुषः।’(तैत्तिरीयोपनिषद् 2/3)
क्योंकि वह जो परमपुरुष है, उसका स्वरूप, उसकी शक्ति एवं प्रकृति सभी कुछ काममय है। किन्तु जब वह अकेला था तो क्या मात्र कामना से ही सृष्टि उत्पन्न हुयी ? नही !! क्योंकि एकाकी पुरुष रमण नहीं कर सकता है। अतः उसने दूसरे की इच्छा की और आलिंगित युगल के परिणाम वाला होकर अपने शरीर को द्विधा विभक्त कर डाला, उससे पति एवं पत्नी अर्थात् स्त्री एवं पुरुष उत्पन्न हुए -
‘स वै नैव रेमे, तस्मादेकाकी न रमते, स द्वितीयमैच्छत्, स हैतावानास यथा स्त्री पुमॉऽसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वैधापातयत्ततः पतिश्च पत्नीं चाभवताम्’ (बृहदारण्यकोपनिषद् 1/2/6)
उस परमात्मा का अर्धभाग जो पुरुष रूपी अग्नि है उसमें जब देवगण अन्न होमते हैं तो उस आहुति से वीर्य की उत्पत्ति होती है -
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति।’(छान्दोग्य0 5/7/2)।
वह वीर्य ही प्राण एवं यश है -
‘प्राणो वै यशो वीर्यम्।’(बृहदारण्यक0 1/2/6)
जो शेष अर्धभाग स्त्रीरूपी अग्नि है उसका उपस्थ ही समिधा है, पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है एवं रतिरूप जो व्यापार है वह अंगार है और उससे जिस सुख की प्राप्ति होती है वही विस्फुलिंग है -
‘योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेंऽगारा अभिनन्दा विस्फुलिंगाः।’(छान्दोग्य0 5/8/1)
बृहदारण्यक श्रुति सृष्टि में प्राप्त होने वाले सभी प्रकार के आनन्द का एकमात्र अधिष्ठान उपस्थ को स्वीकार करती -
‘सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम्।’(2/4/11)
उस स्त्री-उपस्थ-रूपी अग्नि में देवगण पुरुषोपमन्त्रण के माध्यम से वीर्य का हवन करते हैं और उस आहुति से गर्भ की उत्पत्ति होती है-
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्नति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति।’(छान्दोग्य0 5/8/2)
पुनः वह जरायु आवृत्त गर्भ नव या दश माह मातृगर्भ में शयन के अनन्तर पुनः उत्पन्न होता है-
‘उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते।’(छान्दोग्य0 5/9/1)
इस प्रकार कामबीज का उद्गमस्थल परमपुरुष का हृदय है एवं उस कामबीज को धारण करने वाली मातृशक्ति उस पुरुष की माया या प्रकृति है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में कहा भी है -
‘सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्त्तयः संभवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।’
(गीता 14/4)
उस परमात्मा का स्वरूप एवं उसकी स्थिति का ज्ञान कराने वाला वेद ही कामशास्त्र का बीज अर्थात् आदिकारण है। जो क्रमशः विकास को प्राप्त होता हुआ एक शास्त्र-विशेष के रूप में परिणत हो गया।

क्रमशः..........

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति. आभार.

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  2. अभी केवल अनुसरणधारी हुआ हूँ.
    पढूँगा तो अवश्य टिप्पणी करूँगा.

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  3. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
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  5. is gaurav purn karya k liye dhero shubh kamnayen. aapki is abhivyakti nr mujhe khoob prabhavit kiya hai. aapka VIJAYEE abhiyan satat urdhwa gami rahe ishwar se yahi mangla shasan hai. SHRIRANGAM

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  6. इस सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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